गाँव तब और अब

💐गाँव तब और अब💐

आज गांवों में
                   निर्बाह तो हो रहा है,
सभी परम्परागत
             उत्सवों का
आयोजनों का
              पर्वों और 
त्योहारों का।
              पर सभी नीरस नीरस सा,
सभी फीका फीका सा,
         बस सिर्फ कहने भर,
रस्म अदायगी भर।
           न पहले जैसी उमंग
न पहले जैसा रासरंग,
न सत्संग
न रागरंग।

हाँ ,आज दो ही आयोजन
रह गये हैं ,उत्सव मनाने का
दिखने दिखाने
"हम किसी कम नही"
कहलाने का,
पैसा पानी जैसा बहाने का
वह है "शादी और श्राद्ध"।।

गांवों में अब कहाँ सुनने 
को मिलता है पहले ही जैसा--
"फगुआ की फाग
चैता का राग,
लोरिक बिरहा की तान
और आल्हा की गान।
कहां ,सुनने को मिलता है
हफ्तावारी रामायण पाठ
सालाना अखण्डकीर्तन पाठ।"

पहले लोग जुटते थे 
चौपाल में दालान पर
या बरगद के छांव तर,
चर्चा होती थी 
राम पर ,रामायण पर,
गीता पुराण पर।
नोंक झोंक भी होते थे
तू तू में में भी होते थे
पर राम के लिए 
गीता ज्ञान के लिए
वह भी क्षण भर के लिए।

पर आज जुटते है  
तो सभी मस्त मोबाइल पर
या  चर्चा फिलमी स्टाइल पर।
या फिर  जुटतें है मयखाने में
जहां वेशर्मी  की हद, 
पार कर जातें है 
अपनी गप्पों में,
गालियों की बौछारों में,
मार पिट भी कर लेते है
लहुलुहान भी हो जाते हैं
झूठे अभिमान के लिए
झूठी शान के लिए।
बैर भाव पनप जाता हैं
पुश्त दर पुश्त के लिए।

गांव में किंतनी शांति थी पहले,
अपनो की सही  पहचान
बड़ों छोटे का ज्ञान
सब  कुछ था।
 पहले खेत की आली पर
पुरखे करते थे मलयुद्ध
 पर फिर पहिरोपन में आकर
खाते थे साथ साथ एक ही पंगत में,
बैर भाव पनपता कहाँ था?
पर आज एक दूसरे को
बिगाड़ने पर आमदा,
दूसरों की बर्बादी में ही
अपनी खुशी।
आज चारो ओर कोलाहल ही कोलाहल
अशांति ही अशांति
सब कुछ बदला बदला 
कुछ नही है पहले जैसा।
पहले लोगो में
सामाजिक भय था
   सामाजिक दबाब था,
क्या मजाल कोई गलत कर दे,
सभी एकजुट हो जाते थे 
गलत करने की आदत 
छुड़ा देते थे।
पर आज
करते जाओ मनमानी
करते जाओ बुजुर्गों का अपमान
बदलते जाओ शानदार संस्कार
कोई नही कहने वाला
कोई नही सुननेवाला
कोई नही रोकने वाला
कोई नही टोकने वाला,
सभी मूकदर्शक
भीष्मपितामह की तरह।

आज सभी स्वतंत्र  हो गए हैं
नाज़ायज़ लड़ने के लिए
अशांति के बीज बोने के लिए 
और अपने  भविष्य खोने के लिए।
वाह रे गांव 
कहां से चलकर  कहां
गिर गए।
आज कहने को कह रहे हैं कि
हमने तरक्की  की है,
मिट्टी की दीवार 
और फूस की  छावनी से
ईंट की दीवार 
और पक्की छत हो गयी है।
हाँ ,सरसरी निगाह से तो लग रहा है कि
हमने  जमीन पर तरक्की की है,
 पर   हृदय में 
मानवता में?
हृदय में बैर ,जलन और कठोरता का जन्म
और मानवता में ह्रास ही ह्रास।

"पहले  दीवार जब मिट्टी की थी 
और छाबनी फूस की थी
तब लोगों का हृदय 
मिट्टी और फूस से भी काफी मुलायम
मोम  का सा था।
पर आज दीवार ,ईंट की
और छत्त पक्की हो गई तो
मानव का हृदय  इससे भी काफी कठोर
पाषाण सा हो गया है।"
नरेंद्र