परदेश में जिन्दगी
शीर्षक :परदेश में जिंदगी
गांव से दूर,
अकेला,
मायूस,
रोजी रोटी का चक्कर
जीवन हो रहा घुमक्कड।
माता पिता से दूरी
परिवार से अलग रहने की मजबूरी
गांव की मिटटी की याद,
दोस्तों की भारी भारी बात
आ रहा है ख्याल
दूरी का मलाल
कलेजे को रहा साल
बाहर रहना नहीं आसान
पर क्या करें श्रीमान
पापी पेट का सवाल है
जो जी का जंजाल है।
पेट दिया था तो
पंख भी देता
उड़कर सबसे मिल भी आता
पर आधा अधूरा देकर
धरती पर भेजकर
हे प्रभु !दिखाते हो
अपनी बादशाहत
सब कुछ ठीक
पर यही ख़राब है तेरी आदत।
रोजी रोटी वहीँ दो जहाँ सगा व मित्र हो
रोजगार वही दो जहाँ मेरी मिटटी पवित्र हो।