पांच कविताएं
1.अवाक्
राजधानी में घूमने के क्रम में देखा
अनेक महापुरुषों की आदमकद मूर्तियों को
अनेक चौराहों पर
इशारा कर रहे थे
अपनी बनाबटी उंगलियों से
निहार रहे थे चारो ओर
अपनी पथरीली आँखों से
"भ्रष्टाचार की नदियां बहते
लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ते
छुट्टा घूमते हत्यारो को
मायूस भटकते बेरोजगारों को
कार से घूमते लुटेरे ,मक्कारों को
धक्का खाते ईमानदारों को"
यानी ये चश्मदीद गवाह----
"अत्याचार के,बलात्कार के,
अमानवीय व्यहवार के"
पर बेचारे मूक हैं
क्योंकि ये मूर्ति हैं।
हालाँकि आज ये जिन्दा होते
चौराहे पर यूँहीं खड़े होते
ये सब देखते रहते तो स्यात्
ऐसे ही मूक रहते
अगर मुंह खोलने का प्रयास करते तो
मूक कर दिए जाते
जैसे आज है जड़वत ।।।
2.बूझें तो जानें!
सज्जन जहाँ सहता अपमान,
ईमानदार जहाँ रहता परेशान
खून का घूंट पी जी रहा इंसान।
अपराधी को जहाँ मिलता सम्मान
भ्रष्टचारी का जहाँ हो गुणगान
अत्याचारी जहाँ करते उत्थान।
अपराधियों भ्रष्टाचारियो की सिर्फ बची है शान
इंसान का दफ़न हुआ सारा स्वाभिमान
जहाँ प्रशाशन पंगु,जनता निष्प्राण।
जहाँ अपहरण उद्योग चढ़ा परवान
जहाँ दलितों, बनिको का जीना हराम
सब कुछ जहाँ भरोसे राम।
न झारखण्ड न म प्र, न्र राजस्थान
कौन सा भूभाग है वह स्थान
बूझो तो जाने आप विद्वान।
3. सरकारी विद्यालय---
जर्जर भवन
पवन गमन
दर्शन गगन,
दरकती दीवार
टूटते किवाड़
छीजती छत
उगती लत
छात्र नगण्य
वह भी उदंड
शिक्षक निरीक्षक करार
शिक्षक फरार
अंतः अजाश्रम
परिसर पश्वाश्रम
यदा कदा मदिरालय
हाय रे विद्यालय।।
4..दहशत
दहशत के साये में यहाँ जी रहे हैं लोग,
भय से फटे कलेजे यहां सी रहे हैं लोग,
अपराधियों से डर डर यहाँ रह रहे है लोग,
बिना मौत के मर मर यहाँ रह रहे है लोग,
जन्म लेकर सब यहाँ पछता रहे है लोग,
मानव तन पाकर यहाँ अकुता रहे है लोग,
जानवरों से बेहतर नहीं यहाँ रह रहे है लोग,
जानवर ही होता तो अच्छा यहाँ कह रहे है लोग,
चलती फिरती लाश यहाँ बन गए है लोग,
सिर्फ कहने को आदमी यहाँ रह गए हैं लोग।।
5.सादृश्यता
प्रतिदिन तड़के
आँख भींचते ही
सुर्ख़ियों के साथ
अख़बारों में
देखने को मिलता है--
कश्मीर पर्याय बन गया है
"आतंक और दहशत का
सिसकियों और आहों का
कत्लों और हादसों का"
जिसे पढते ही
रोंगटे खड़े हो जाते है
माथे पर बल पड़ जाता है
और सोचता हूँ
वाकई भारत के स्वर्ग में
ऐसा कही संभव है?
पर पुनः जब
दूसरे शीर्षक में
मोटे मोटे अक्षरों में
पढता हूँ --
बिहार में भीषण नरसंहार
अनेक मौत के घाट पार
सामूहिक बलात्कार।
तो दिल में विश्वास की लकीरे खीच जाती है
कि जब बुद्ध -महावीर की
पूज्य पूण्य धरा पर
यह संभव है तो
भारत के स्वर्ग में क्यों नहीं!
(1990से2005के बीच की रचनाये बिहार के सन्दर्भ में)