कवियों को झेलना आसान नहीं
व्यंग्य
शीर्षक:कवियों को झेलना आसान नही
एक मित्र ने अपनी व्यथा सुनाई,
क्या कहूँ कवि नरेंद्र भाई।
लोग शाम के दर पर आ जाते हैं,
कई कप चाय गटक जाते है।
इधर उधर की बाते कर जाते है
टोला पड़ोस की निंदा कर जाते है।
घर के अंदर बीबी भूनभुनाती है
संताने भी देखकर बुदबुदाती है।
हम कोई काम कर नही पाते
बच्चे भी शाम को पढ़ नही पाते।
मैंने दिया सुझाव
कि है एक उपाय
दर पर शाम को काव्य पाठ करवाएं,
हम जैसे नीरस कवियों को ही बुलाएं
देखने को मिलेगा तत्काल असर,
फिर मित्रगण कभी न आएंगे नज़र।।
मरता क्या न करता,सुझाव अच्छा लगा
दूसरे ही शाम,दर पर जमावड़ा लगा।
एक ही कविता में उनके मित्र खिसक गये
उनके बाल बच्चे भी घर मे दुबक गए।
वो महाशय भी अब बार बार ऊँघने लगे
फिर हाथ जोड़कर यूं कहने लगे।
अभी बन्द कर दें ,फिर जुटेंगे कभी,
हमलोगों को तो रहना ही है यहीं।
मैंने कहा कोई बात नही
इसमे मेरा कोई स्वार्थ नही।
काव्य पाठ बन्द कर दिया
अपने घर को चल दिया।।
फिर कभी वो घर नही बुलाये,
सोचा मैं,चलकर देख आएं।
वो सज्जन रास्ते मे ही दिख पड़े
जोर जोर से दूर ही से चीख पड़े।
नही है काव्य पाठ करवाना
नही है मुझे सुनना सुनवाना।
जिस दिन से हुआ था वो आयोजन
उसदिन से नही दिखाई दिए मित्रगण।
"अब मैं मरूँगा तो वो आ पाएंगे या नही
मुझे भय है वो कन्धा दे पाएँगे या नही।"
मन ही मन मैं सोचा ,
अपने को कवि होने पर कोसा
"कविता सुनना सबके बस का काम नही
आज कवियों को झेलना आसान नही।।"
नरेन्द्र