मानव तन

मानव तन क्या है?
इस लोक में जोंक की भांति,मानव क्यों लटपटा रहा है?
देख लो दिव्यदृष्टि से, आगे काल जीभ चटपटा रहा है।
जीवन अनिश्चित जानकर भी, छल क्यों अपना रहा है?
क्या तुम भ्रमित हो,या तेरा मन मष्तिस्क सपना रहा है?
,यह सारी दुनिया,अपना पराया ,यह सब जाया काया।
आंख मूंदते सभी सफाया,यह भोग विलास,धन माया।।
मानव तन क्या है?यह मात्र पंचतत्व निर्मित  किला है,
छल कपट  क्या अपनाना ,ये तो भगवन  की लीला है।।
यह मानव तन मात्र  है?एक प्रकार की चरम रेखा,
पा इसे देवत्व प्राप्त करो या लो  चौरासी लाख की लेखा।।
जनकल्याण में लगे रहोगे  तभी जन्म मरण से छुटकारा।
नही तो इस संसार मे ,भटको योनि योनि मारा मारा।।
मानव कान खोल सुनलो,पार्थिव चीज़ काम न आएगी।
सुंदर करनी मात्र तुम्हारी , इस जग में रह जाएगी।।👌
                                                            नरेंद्र