नरेंद्र की लेखनी से
नरेंद्र की लेखनी से
सड़क पर कुत्ते अड्डे जमाये हुए है।बड़े कोई गुजर रहे हैं तो गुर्रा कर रास्ता दे रहा है।घर के सामने से दो बच्चे निकले उसे भौंक कर घर के अंदर कर दिया।सड़क पर एक बच्चा आ रहा था उसे आने की दिशा में ही लौटने को बाध्य कर दिया। अब मैं समझ नही पा रहा हूं कि कुत्ते लॉकडौन का मतलब समझ गया या सड़क पर अब अपना एकाधिकार समझ लिया है।22 दिनों से खाली सड़के देखकर उसे लग रहा है कि सड़के अब उसी के लिए आरक्षित हो गयी है।किसी का आना जाना अब उसे नागवार लगने लगा है। पहले कूड़े कचड़े की जगह पर अपना आधिपत्य समझता था और कचड़े चुनने वाले को अपना प्रतिद्वंदी मानता थ।पर अब तो उसके मनसूबे सातवे आसमान पर है और हर आम खास से दो दो हाथ करने पर आमदा है।
मानो अब यह कह रहा हो---
💐मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है
जो है नाम वाला वह भी लॉकडौन है।।
जिसकी बड़ी कोठी ,उसका भी बड़ा नाम था
लिफ्ट से उतरता था ,सीढ़ी का नही काम था।।
जिसका घर छोटा ,उसको भी बड़ा गुमान था
जाते थे दरवाज़े भगा देना उसका काम था।।
मानव होने का उसे बहुत बड़ा गुमान था ।
कोरोना की आपदा का उसे न कुछ भान था।
अंदर ही दुबके रहो, बाहर कुत्ते को आराम है,
मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है।।💐
या यह कह रहा हो--
👌मेरी गलियों में ना रखो कदम,आज के बाद
तेरे दर मांगने न जाएँगे कुछ आज के बाद।।
तेरे दर पर झांकना,समझ लेना एक सपना था
अब घर मे ही बैठे रहो जो तेरा अपना था।।
हमे अब अपना न समझना आज के बाद
मेरी गलियों में न रखना कदम आज के बाद।।💐
नरेन्द्र
16.04.2020