मोबाइल की वेदना

मोबाइल की वेदना
मोबाइल कहे मालिक से --मुझे राहत दें   नाथ,
उंगली करना कम करो,अब बंद करो आघात।।
धरती पर न जाने ,कैसे कैसे पैदा हो गए लोग।
जिसे सिर्फ दूसरों को ,लग गया कष्ट देने का रोग।।
जबसे इसके पास  हूँ आया,तनिक न पाया सुख
उंगली से दबा दबा कर मुझे,सदा दिया ये दुख।।
कभी हँसता, कभी गुनगुनाता, कभी ये  बुदबुदाता है
पता नही ये मुझसे ,क्या असीम आनंद को पाता है।।
ये अपने पागल ,मित्र भी पागल,पागल है संसार
इसके मोबाइल प्रेम से ,मोबाइल ही है शर्मसार।।
 मन की बात तो लिखता नही,तौ भी समझे ये श्रेष्ठ
दिन रात यूँही करते रहता,इधर उधर  कॉपी पेस्ट।।
इधर से आया उधर को  भेजना ,दिन रात का काम
मुझे चैन से रहने न देता,जीना कर दिया मुझे हराम।।
माता- पिता, पुत्र,पत्नी जब भी रहता परिवार के संग
आपस में कोई बात न करता ,सभी मुझे ही करता तंग।।
हार्दिक कष्ट होता उस वक्त,जब फैलाता ये अफवाह
मुझे ये माध्यम बनाता जिससे मेरा दिल रहा  कराह।।
मेरे बिना चैन नही  इसे,भले रह जाय ये भूखे पेट,
सब अभाव झेल  सकता  ,पर चालू रहे इसका नेट।।
मेरे बगैर न जी सकता है ,ये मेरा पक्का दीवाना है
यही एक खुशी की बात, यह नही अफसाना है।
नरेंद्र
22.04.2020