निरीह बैंकर्स

कविता -निरीह बैंकर्स

आयो जनसेवक महोदय जी पधारो हमारे बैंक
जी भर कर मारो  बैंकर्स को, चाहे जो हो रैंक।
कुछ भी चूं चपड़ नहीं करेगें,कार्मिक या अधिकारी
खटतेखटते मर गईहै,  अस्मिता इनकी विचारी।
मारपीट कर जाओ,ये निरीह मामला न दर्ज कराएँगे
उलटे अकड़े रहो,संतुष्टि पत्र केलिए ये दौड़ लगाएंगे।
हे महाशय व्यर्थ में ,एयरलाइन्स जैसे से लेते पंगा।
हाथ में खुजली हो,तो बैंक में आ करो महोदय दंगा।
मारो पीटो ,गाली दो ,करो बैंकर्स को  खड़े  अर्धनंग।
कोई  नहीं खड़े होने वाला,इन वेचारे बैंकर्स के संग।।
आपके पक्ष में रहेंगे ,बैंक के बड़े नेता और प्रबन्धन।
मार गाली खाकर भी दुःख झेलता ये बैंक के सज्जन।।
जब जब धौंस दिखाना हो,महोदय पधारो कोई भी बैंक।
जी भर कर  मारो गरिआओ बैंकर्स को होकर अति निशंक।।
प्राचीन बैंकर्स
नरेंद्र