सुस्वागतम बैंक
बेहतर ग्राहक सेवा (व्यं ग्य )
‘ सुस्वागतम् बैंक ’ की शाखा में एक ग्राहक आया
काउण्टर पर अपना पासबुक बढाया
सर ! इसमें पैसे चढ़वाना है
जल्द् कर दें दूर जाना है
बैठे, बाबू ने नजरें फेरी
ग्राहक पर ऑंखे तरेरी
देखते नहीं हैं मैं क्या कर रहा हूँ,
मैं काम करते-करते मर रहा हूँ ।
चले जा अंदर मैनेजर से करवाना,
वही बैठे हैं उन्हीं से चढ़वाना,
ग्राहक चुप रहा कुछ नहीं बोला,
पर वह उस स्थाान से नहीं डोला,
जानता था कि काम यहीं होना है,
अन्दर आने-जाने से कुछ नहीं होना है ।
धीरे से फिर पासबुक बढ़ाया
बाबू चाय की चुस्की लेते गुर्राया,
मुंह फेरकर दोस्तों से गप्प लड़ाया,
भारतीय राजनीति से स्थाानीय तक आया,
फिर अनमने भाव से पासबुक लिया,
उस पर बची एक इन्ट्री दर्ज किया,
फिर पास बुक को स्टाईल में फेंका,
और ग्राहक को हिकारत की दृष्टि से देखा,
ग्राहक फर्श पर गिरा पासबुक उठाया ,
अब उसकी बारी थी वह गुर्राया,
बोला ---
यही पास बुक आपका भाग्यय विधाता है,
..यही पासबुक आपका अन्नपदाता है
अगर यह पासबुक न होता हम न होते
शायद कहीं भीड़ में आप खो गए होते । नरेन्द्र