जुते की व्यथा




जूत्ते की व्यथा
एक जूत्ता सोचा मन ही मन
स्वामी क्यों नही रहा पहन,
कई दिनों से अकड़ी देह
मालिक का नहीं जो मिला स्नेह।
अपना जोड़ा से वो जुत्ता बोला
अपने मन का राज को खोला-
"मेरी बात को सुनो मेरा यार
मन मे आ रहा   है कुविचार।
स्वामी कहीं न जाता पहन के,
इसपर विचार करो गहन से।
लगता है मालिक दिया त्याग
हमदोनो का फूट गया है भाग।
कितना उसका था हम प्यारा
फिर भी हमे  वे क्यों दुत्कारा।
प्रतिदिन हमें चमकाता था,
पहन हमे वो इठलाता था।
नहीं किया हम विश्वासघात
गरमी ,जाड़ा हो या बरसात।
कभी हमने न पैर को काटा
क्योंकि ठहरे हम जुत्ता  बाटा।
जूत्ता, कुत्ता और असली यार,
कभी न होता ये तीनो गद्दार।।
ये सदा होते  नमकहलाल,
चाहे सामने खड़ा रहे काल।
स्वामी को सदा दिया हम सुख
फिर भी त्यागा इसी का दुःख।"
दूसरा बोला -
"स्वामी पर  हम  करें विश्वास
धैर्य रखे कायम रहे  आस।
आंख कान बंद रखते हो,
बाहर कुछ नही देखते हो।
बाहर घूमता दुष्ट कोरोना,
चुपचाप पड़े रहो ये कोना।
घर से बाहर नही  है जाना ,
सामाजिक दूरी  है बनाना ।
यदि घर मे नही रहना है
आगे और भी कष्ट सहना है।
भारत मे कोरोना  को दो मात।
मालिक को हमसब दे साथ।
घर मे रहो  सब लॉकडौन।
कहो कोरोना डाउन डाउन।।""
नरेन्द्र सिंह
17.04.2020