इंदिरागांधी

शीर्षक: इंदिरा 

19 नवंबर सन 1917 दिन था शुभ सोमवार।
कमला के गर्भ से हुआ था इंदिरा का अवतार।।
भारत का कहना क्या? था अखिल विश्व से नाता।
इन्दिरा तू धन्य थी ,तीसरी दुनिया भाग्य विधाता।।
भारत की देवी थी, 101देश के दिल की मालिक,
सहसा दो हत्यारो ने भारत के मुंह पोत दी कालिख।।
31 अक्टूबर सन1984, था काला दिन बुधवार।
क्या इंदिरा तू चली गई,तनिक न होता इतवार।।
अल्पसंख्यकों की सहारा थी,हरिजनों की थी हिम्मत।
जन जन की रहनुमा थी,विश्व मे थी तुम्हारी  कीमत।।
जहां कहीं किसी गरीब देश पर ,अगर होता था प्रहार।
झट इंदिरा तू सहारा देती,बन जाती थी तू मददगार।।
दिलाई अपने बलबूते,पाक से बंगलादेश की मुक्ति,
घूम घूम कर देश विदेशो में,दी विश्व शांति की सूक्ति।।
परमाणु टेस्ट,आर्यभट उड़ान,बैंको के राष्ट्रीयकरण।
निर्गुट सम्मेलन,एशियाई खेल,अनेकानेक समीकरण।।
राकेश व्योमेशपुत्र बना,सफल रहा अंटार्टिका अभियान।
किसमे इतनी क्षमता,जो गिनावे इंदिरा के कार्य महान।।
'गरीबी हटाओ 'एक मात्र लक्ष्य,कार्यक्रम था बीस सूत्री।
भारत को शिखर पहुंचाकर ,कहाँ चली गई भारतपुत्री।।
नरेन्द्र
(यह रचना 1 नवंबर 1984 को मेरे द्वारा रची गयी थी)